बंदर मामा
पजामा पहनकर दावत खाने निकले शरारती बंदर मामा की कविता
एक मस्तीभरी पारंपरिक कविता जंगल के सबसे शरारती जानवर के बारे में।
बंदर मामा, पहन पैजामा,
दावत खाने आए,
ढीला कुरता, टोपी, जूता,
पहन बहुत इतराए।
रसगुल्ले पर जी ललचाया,
मुंह में रखा गप से खाए,
नरम नरम था, गरम गरम था,
जीभ जल गई लप से।
बंदर मामा रोते-रोते,
वापस घर को आए,
फेंकी टोपी, फेंका जूता,
रोए और पछताए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बंदर मामा किस उम्र के बच्चों के लिए उपयुक्त है?
यह कविता 2 से 7 साल के बच्चों के लिए आदर्श है, इसकी सरल भाषा और लयबद्ध शब्दों के कारण।
क्या इस कविता को सुना भी जा सकता है?
हां, इस पेज पर बिल्ट-इन नैरेटर है जो कविता को हिंदी में बोलकर सुनाता है।
क्या यह एक पारंपरिक कविता है?
हां, यह भारत की सबसे प्रिय और जानी-मानी बच्चों की कविताओं में से एक है, जो पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है।